October 9, 2018

॥ श्रीरामरक्षास्तोत्रम्‌ ॥

 
श्रीगणेशायनम: ।
अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य ।
बुधकौशिक ऋषि: ।
श्रीसीतारामचंद्रोदेवता ।
अनुष्टुप्‌ छन्द: । सीता शक्ति: ।
श्रीमद्‌हनुमान्‌ कीलकम्‌ ।
श्रीसीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोग: ॥
 
॥ अथ ध्यानम्‌ ॥
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्दद्पद्‌मासनस्थं ।
पीतं वासोवसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्‌ ॥
वामाङ्‌कारूढसीता मुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं ।
नानालङ्‌कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डनं रामचंद्रम्‌ ॥
 
॥ इति ध्यानम्‌ ॥ 
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्‌ ।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्‌ ॥१॥ 
 
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्‌ ।
जानकीलक्ष्मणॊपेतं जटामुकुटमण्डितम्‌ ॥२॥ 
 
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तं चरान्तकम्‌ ।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्‌ ॥३॥
 
रामरक्षां पठॆत्प्राज्ञ: पापघ्नीं सर्वकामदाम्‌ ।
शिरो मे राघव: पातु भालं दशरथात्मज: ॥४॥
 
कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रिय: श्रुती ।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सल: ॥५॥
 
जिव्हां विद्दानिधि: पातु कण्ठं भरतवंदित: ।
स्कन्धौ दिव्यायुध: पातु भुजौ भग्नेशकार्मुक: ॥६॥
 
करौ सीतपति: पातु हृदयं जामदग्न्यजित्‌ ।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रय: ॥७॥
 
सुग्रीवेश: कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभु: ।
ऊरू रघुत्तम: पातु रक्ष:कुलविनाशकृत्‌ ॥८॥
 
जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्‌घे दशमुखान्तक: ।
पादौ बिभीषणश्रीद: पातु रामोSखिलं वपु: ॥९॥
 
एतां रामबलोपेतां रक्षां य: सुकृती पठॆत्‌ ।
स चिरायु: सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्‌ ॥१०॥
 
पातालभूतलव्योम चारिणश्छद्‌मचारिण: ।
न द्र्ष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभि: ॥११॥
 
रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन्‌ ।
नरो न लिप्यते पापै भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥१२॥
 
जगज्जेत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्‌ ।
य: कण्ठे धारयेत्तस्य करस्था: सर्वसिद्द्दय: ॥१३॥
 
वज्रपंजरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्‌ ।
अव्याहताज्ञ: सर्वत्र लभते जयमंगलम्‌ ॥१४॥
 
आदिष्टवान्‌ यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हर: ।
तथा लिखितवान्‌ प्रात: प्रबुद्धो बुधकौशिक: ॥१५॥
 
आराम: कल्पवृक्षाणां विराम: सकलापदाम्‌ ।
अभिरामस्त्रिलोकानां राम: श्रीमान्‌ स न: प्रभु: ॥१६॥
 
तरुणौ रूपसंपन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥१७॥
 
फलमूलशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥१८॥
 
शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्‌ ।
रक्ष:कुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघुत्तमौ ॥१९॥
 
आत्तसज्जधनुषा विषुस्पृशा वक्षया शुगनिषङ्‌ग सङि‌गनौ ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणा वग्रत: पथि सदैव गच्छताम्‌ ॥२०॥
 
संनद्ध: कवची खड्‌गी चापबाणधरो युवा ।
गच्छन्‌मनोरथोSस्माकं राम: पातु सलक्ष्मण: ॥२१॥
 
रामो दाशरथि: शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।
काकुत्स्थ: पुरुष: पूर्ण: कौसल्येयो रघुत्तम: ॥२२॥
 
वेदान्तवेद्यो यज्ञेश: पुराणपुरुषोत्तम: ।
जानकीवल्लभ: श्रीमानप्रमेय पराक्रम: ॥२३॥
 
इत्येतानि जपेन्नित्यं मद्‌भक्त: श्रद्धयान्वित: ।
अश्वमेधायुतं पुण्यं संप्राप्नोति न संशय: ॥२४॥
 
रामं दूर्वादलश्यामं पद्‌माक्षं पीतवाससम्‌ ।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नर: ॥२५॥
 
रामं लक्शमण पूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुंदरम्‌ ।
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्‌ 
राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथनयं श्यामलं शान्तमूर्तिम्‌ ।
वन्दे लोकभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम्‌ ॥२६॥
 
रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नम: ॥२७॥ 
 
श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम ।
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम ।
श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥२८॥
 
श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥२९॥
 
माता रामो मत्पिता रामचंन्द्र: ।
स्वामी रामो मत्सखा रामचंद्र: ।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु ।
नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥३०॥
 
दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा ।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनंदनम्‌ ॥३१॥
 
लोकाभिरामं रनरङ्‌गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्‌ ।
कारुण्यरूपं करुणाकरंतं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये ॥३२॥
 
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्‌ ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥३३॥
 
कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम्‌ ।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम्‌ ॥३४॥
 
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसंपदाम्‌ ।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्‌ ॥३५॥
 
भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसंपदाम्‌ ।
तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम्‌ ॥३६॥
 
रामो राजमणि: सदा विजयते रामं रमेशं भजे ।
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नम: ।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोSस्म्यहम्‌ ।
रामे चित्तलय: सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥३७॥
 
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥३८॥
 
इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं संपूर्णम्‌ ॥
 

॥ श्री सीतारामचंद्रार्पणमस्तु ॥



August 31, 2018

सन १९९६ से प्रतिवर्ष #सद्गुरु श्रीअनिरुद्ध के मार्गदर्शन के अनुसार श्रद्धावान #श्रीरामनवमी_उत्सव बहुत ही #आनंद एवं उत्साह के साथ संपूर्ण #भक्तिमय वातावरण में मना रहे हैं।

दिपशिखा आगमन 
सुबह दिपशिखा के आगमन के साथ श्रीरामनवमी उत्सव का शुभारंभ होता है। यह दिपशिखा साईनिवास, वान्द्रे से आती है।

श्रीसाईराम सहस्त्र यज्ञ 
इस दिफ्शिखा के द्वारा ’श्रीसाईराम सहस्त्रयज्ञ’ की अग्नि प्रज्वलित की जाती है। दिन भर तारकम्न्त्रोंके जाप के साथ चलने वाले इस यज्ञ में ’क्षेमकल्याण आपत्तिनिवारक पवित्र समिधाओं’ को श्रद्धावान स्वेच्छा से अर्पण करते हैं। इन समिधाओंका अर्पण करने से भक्त के मन एवं प्राणों को सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है, साथ ही गतजन्मों के पापोंका भर्जन होता है ऐसा श्रद्धावानोंका विश्वास है।

रेणुकामाता पूजन 
रामनवमी उत्सव के दिन उत्सव स्थल पर रेणुकामाता का पूजन किया जाता है। तांदळे के रुप मे याने रेणुकामाता के मुख के रुप में मॉ का आगमन होते ही माता का जयजयकार किया जाता है। रेणुकामाता का औक्षण करके मंगलवाद्यों के घोष में उत्साह के साथ स्वागत किया जाता है। फिर रेणुकामाता का षोडश उपचार अर्पण कर पूजन करके ’सहस्त्रधारा अभिषेक’ किया जाता है जिससे अभिषेक किया जाता है, उस पात्र की रचना गोमाता के स्तन की रचनाके समान होने के कारण अनेक धाराओंके रुप मे अभिषेक होता है और इसी कारण इसे ’सहस्त्रधारा अभिषेक’ कहा जाता है। फिर स्वयं सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्ध रेणुकामाता की आरती करते है। माता रेणुका की वत्सलता की प्राप्ति जिस तरह भगवान की परशुरामजी को हुई, उसी तरह हम सबको भी उनकी वत्सलता की प्राप्ति हो’ यह प्रार्थना भक्तगण मॉ के चरणों में करते है।

रामजन्म
रामनवमी का सबसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम है ’रामजन्म समारोह’। परमपूज्य सद्‌गुरु श्री अनिरुद्ध के मार्गदर्शन के अनुसार दोपहर १२.३० बजे श्रीरामजन्म पारंपारिक पद्धतिसे मनाया जाता है। सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्ध के बचपन में पालने के रूप में जिस झोली का उपयोग किया गया, उसी का उपयोग श्रीराम-जन्म के समय किया जाता है। ’कुणी गोविंद ध्या कुणी गोपाळ घ्या’ के गजर में और रामजन्म का पलना गने में सभी को सोंठ आदि से बना ’सुंठवडा’ प्रसाद के रुप में दिया है। यह पालना और उसमें प्रतीक स्वरूप में विराजमान श्रीराम इनका श्रद्धावान दर्शन कर सकते है।

साईनाथ महिन्मभिषेक
श्री साईसदाशिव मूर्ति को ‘श्रीसाईनाथ महिन्माभिषेक’ किया जाता है। हर एक भक्त इस समय स्वेच्छा से प्रतीकात्मक पूजा-अभिषेक कर सकता है। यह अभिषेक परिवार के सभी व्यक्तियों के स्वास्थ्य के लिए यह अभिषेक उपयोगी साबित होता है, ऐसी श्रद्धा है।

तळीभरण
मंगल्वाद्यों के घोष में ‘रक्ष रक्ष साईनाथ, श्री साईराम’ यह जाप करते हुए जब श्रद्धावान तळीभरण करता है, तब उस श्रद्धावान को अन्नदात करने का पुण्य तो मिलता ही है, साथ ही परमेश्वर के आशिर्वाद भी मिलते हैं। श्रद्धावान इस विधि में आनन्द से सम्मिलित होते है।

अखंड जप
‘ॐ रामाय रामभद्राय रामचंद्राय नम:।’ यह जाप उत्सवस्थल पर दिन भर अखंड रुप से चलता रहता है। श्रद्धावान एक-दुसरे के माथे पर तिलक करके एक-दुसरे को प्रणाम करते है और बडे ही भक्तीभाव के साथ इस जाप में सम्मिलित होते हैं

श्रीसाईचच्चरित अध्ययनकक्ष
रामनवमी उत्सवस्थल पर एक कक्ष में श्रीसाईच्चरित के एक अध्याय का सामूहिक अखंड पाठ चलता रहता है। इस कक्ष को ’श्रीसाईसच्चरित अध्ययन कक्ष’ या ’आद्यपिपा कक्ष’ कहते है। ‘आद्यपिपादादा’ यानी ‘श्री. सुरेशचंद्र पांडुरंग दत्तोपाध्ये’ ये श्रीसाईनाथजी के निस्सीम भक्त और सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्ध के श्रेष्ठ श्रद्धावान थे। जैसा कि श्रीसाईसच्चरित में बताया गया है, उसके अनुसार प्रतिवर्ष ‘रामनवमी’, ‘गुरुपौर्णिमा’, ‘कृष्णाष्टमी’, और ‘दशहरा’ इन चार पवित्र दिनों पर वे अपने श्रीसाईसच्चरित पारायण सप्ताह की सांगता करते थे और यह उनकी ६० वर्षों की परिपाठी थी। श्रीसाईसच्चरित के ग्यारहवे अध्याय में आये वर्णन के अनुसार श्रीरामचरणोंकी अखंड प्राप्ति होगी’ यह पक्ति उनके जीवन में सच हुई थी। हर एक श्रद्धावान, जो इस कक्ष में प्रवेश करता है, वह आद्यपिपा की तरह पूर्ण श्रद्धावान बनने का निश्चय करके श्रीसाईसच्चरित के अध्याय के पाठ मे सम्मिलित होता है।

श्रीरामनवमी उत्सव
श्रद्धावानोंके मन में रामभक्ति सदैव जागृत रहे, दिन ब दिन बढती ही रहे और हर एक के जीवन में श्रीरामचरणोंकी ’अखंड प्राप्ति’ होने की स्थिति रहे इसी आत्मीयता के साथ सद्‌गुरु श्री अनिरुद्ध अखंड कार्यरत रहते हैं। ’रामजन्मोत्सव’ मनाने के पीछे उनका यही हेतु है।

इस तरह सद्‌गुरु श्री अनिरुद्ध श्रद्धावानों के मन में रामभक्ती को सदैव जागृत रखते हैं। रामनावमी उत्सव की रात को पूर्णाहुती के बाद साईराम सहस्त्रयज्ञ संपन्न होता है और फिर महाआरती के बाद रामनवमी उत्सव की सांगता होती है। श्रीरामनवमी उत्सव में सम्मिलित हुआ हर एक श्रद्धावान यह ’अनिरुद्ध-महावाक्यम्‌’ अपने जीवन में उतारने का निर्धार करते हुए ही घर लौटता है।

युद्ध करेंगे मेरे श्रीराम। समर्थ दत्तगुरु मूल आधार ॥
मै सैनिक वानर साचा। रावण मरेगा निश्चित ही ॥



August 30, 2018
॥ श्रीरामरक्षा स्तोत्रम्‌ ॥
 
श्रीगणेशायनम: ।
अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य ।
बुधकौशिक ऋषि: ।
श्रीसीतारामचंद्रोदेवता ।
अनुष्टुप्‌ छन्द: । सीता शक्ति: ।
श्रीमद्‌हनुमान्‌ कीलकम्‌ ।
श्रीसीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोग: ॥
 
॥ अथ ध्यानम्‌ ॥
 
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्दद्पद्‌मासनस्थं ।
पीतं वासोवसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्‌ ॥
वामाङ्‌कारूढसीता मुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं ।
नानालङ्‌कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डनं रामचंद्रम्‌ ॥
 
॥ इति ध्यानम्‌ ॥ 
 
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्‌ ।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्‌ ॥१॥ 
 
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्‌ ।
जानकीलक्ष्मणॊपेतं जटामुकुटमण्डितम्‌ ॥२॥ 
 
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तं चरान्तकम्‌ ।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्‌ ॥३॥
 
रामरक्षां पठॆत्प्राज्ञ: पापघ्नीं सर्वकामदाम्‌ ।
शिरो मे राघव: पातु भालं दशरथात्मज: ॥४॥
 
कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रिय: श्रुती ।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सल: ॥५॥
 
जिव्हां विद्दानिधि: पातु कण्ठं भरतवंदित: ।
स्कन्धौ दिव्यायुध: पातु भुजौ भग्नेशकार्मुक: ॥६॥
 
करौ सीतपति: पातु हृदयं जामदग्न्यजित्‌ ।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रय: ॥७॥
 
सुग्रीवेश: कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभु: ।
ऊरू रघुत्तम: पातु रक्ष:कुलविनाशकृत्‌ ॥८॥
 
जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्‌घे दशमुखान्तक: ।
पादौ बिभीषणश्रीद: पातु रामोSखिलं वपु: ॥९॥
 
एतां रामबलोपेतां रक्षां य: सुकृती पठॆत्‌ ।
स चिरायु: सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्‌ ॥१०॥
 
पातालभूतलव्योम चारिणश्छद्‌मचारिण: ।
न द्र्ष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभि: ॥११॥
 
रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन्‌ ।
नरो न लिप्यते पापै भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥१२॥
 
जगज्जेत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्‌ ।
य: कण्ठे धारयेत्तस्य करस्था: सर्वसिद्द्दय: ॥१३॥
 
वज्रपंजरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्‌ ।
अव्याहताज्ञ: सर्वत्र लभते जयमंगलम्‌ ॥१४॥
 
आदिष्टवान्‌ यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हर: ।
तथा लिखितवान्‌ प्रात: प्रबुद्धो बुधकौशिक: ॥१५॥
 
आराम: कल्पवृक्षाणां विराम: सकलापदाम्‌ ।
अभिरामस्त्रिलोकानां राम: श्रीमान्‌ स न: प्रभु: ॥१६॥
 
तरुणौ रूपसंपन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥१७॥
 
फलमूलशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥१८॥
 
शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्‌ ।
रक्ष:कुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघुत्तमौ ॥१९॥
 
आत्तसज्जधनुषा विषुस्पृशा वक्षया शुगनिषङ्‌ग सङि‌गनौ ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणा वग्रत: पथि सदैव गच्छताम्‌ ॥२०॥
 
संनद्ध: कवची खड्‌गी चापबाणधरो युवा ।
गच्छन्‌मनोरथोSस्माकं राम: पातु सलक्ष्मण: ॥२१॥
 
रामो दाशरथि: शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।
काकुत्स्थ: पुरुष: पूर्ण: कौसल्येयो रघुत्तम: ॥२२॥
 
वेदान्तवेद्यो यज्ञेश: पुराणपुरुषोत्तम: ।
जानकीवल्लभ: श्रीमानप्रमेय पराक्रम: ॥२३॥
 
इत्येतानि जपेन्नित्यं मद्‌भक्त: श्रद्धयान्वित: ।
अश्वमेधायुतं पुण्यं संप्राप्नोति न संशय: ॥२४॥
 
रामं दूर्वादलश्यामं पद्‌माक्षं पीतवाससम्‌ ।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नर: ॥२५॥
 
रामं लक्शमण पूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुंदरम्‌ ।
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्‌ 
राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथनयं श्यामलं शान्तमूर्तिम्‌ ।
वन्दे लोकभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम्‌ ॥२६॥
 
रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नम: ॥२७॥ 
 
श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम ।
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम ।
श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥२८॥
 
श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥२९॥
 
माता रामो मत्पिता रामचंन्द्र: ।
स्वामी रामो मत्सखा रामचंद्र: ।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु ।
नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥३०॥
 
दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा ।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनंदनम्‌ ॥३१॥
 
लोकाभिरामं रनरङ्‌गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्‌ ।
कारुण्यरूपं करुणाकरंतं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये ॥३२॥
 
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्‌ ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥३३॥
 
कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम्‌ ।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम्‌ ॥३४॥
 
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसंपदाम्‌ ।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्‌ ॥३५॥
 
भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसंपदाम्‌ ।
तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम्‌ ॥३६॥
 
रामो राजमणि: सदा विजयते रामं रमेशं भजे ।
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नम: ।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोSस्म्यहम्‌ ।
रामे चित्तलय: सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥३७॥
 
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥३८॥
 
इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं संपूर्णम्‌ ॥
 
॥ श्री सीतारामचंद्रार्पणमस्तु ॥


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